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बस्ती

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में इन दिनों मुस्लिम महिलाओं के हाथों से बना "राम जी पेड़ा" देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी जमकर धूम मचा रहा है. इन पेड़ों के प्रसिद्ध होने के पीछे कारण देशी स्टाइल में बनाना है. जिसे बड़े-बड़े बर्तनों में लकड़ी के चूल्हों की मदद से महिलाओं द्वारा गुड़ डालकर शुद्ध दूध व देशी घी से बनाया जाता है. जिस वजह से ये काफी स्वादिष्ट होते हैं, इतना ही नहीं लकड़ी के चूल्हों पर पकने की वजह से इन पेड़ों में सोंधापन आने से इनके स्वाद में चार चांद लग जाते हैं.

गुड में बनने की वजह से ये शुगर फ्री होते हैं, जिस वजह से इन पेड़ों की मांग देश से ज्यादा विदेशों में है. क्योंकि ये किसी को नुक़सान नहीं पहुंचाते हैं. हालांकि इन महिलाओं का सपना साकार नहीं होता अगर इन्हें युवा उद्यमी का साथ नहीं मिला होता. क्योंकि युवा उद्यमी ने ही इन्हें बिजनेस प्लान बताया. जिसके बाद महिलाओं ने इस अमल में लाया.

अयोध्या में भोग लगाने के बाद भेजा जाता है विदेश
जानकारी के अनुसार बस्ती जिले के रहने वाले युवा उद्यमी मनीष मिश्रा गांव ने बेरोज़गार और गरीब महिलाओं को रोजगार के लिए पहले तो पेड़े बनाने की ट्रेनिंग दी. उसके बाद उन्हें रा-मैटेरियल देकर काम की शुरुआत की और धीरे-धीरे महिलाओं का कारवां बढ़ता गया और आज 500 गरीब महिलाएं इस रोजगार से जुड़ीं हैं. ये महिलाएं हजारों रुपए कमाकर अपने परिवार का भरण पोषण कर रही हैं, सबसे हैरानी कि बात यह है कि इस काम में मुस्लिम महिलाएं भी अपना हाथ बंटाती हैं.

"राम जी का पेड़ा" देशी स्टाइल में बेहद ही स्वच्छता और हाइजीन तरीके से बनाया जाता है. जिसे लकड़ी के चूल्हे पर दूध में गुड़ डालकर शुद्ध देशी घी में पकाया जाता है. चूल्हे पर पकने की वजह से पेड़े में सोंधी खुशबू आ जाती है. जिससे इसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है. गुड़ से बने इस पेड़े की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूर्ण रूप से शुगर फ्री होता है. जिस वजह से इसकी देश विदेश के बाजारों में मांग है. "राम जी पेड़ा" बनने के बाद पहले अयोध्या जाता है. यहां भगवान राम को भोग लगाया जाता है फिर देश- विदेश में इसकी सप्लाई की जाती है.

दो दिनों में ही तैयार हो जाता है कई किलो पेड़ा
इस संस्था के मैनेजर ने बताया कि हमारा "राम जी का पेड़ा"देश ही नहीं बल्कि विदेशों में जैसे रूस व यूरोप जैसे देशों में सप्लाई किया जा रहा है. ऑर्डर आने के बाद महिलाएं काम में जुट जाती हैं. दो दिनों में ही कई किलो पेड़े बनाकर उसे मटके में पैक कर देती हैं. जिसके बाद इन पेड़ों का अयोध्या में भोग लगाया जाता है. फिर देश के अलावा विदेशों में भी सप्लाई किया जाता है.

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