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 नई दिल्ली

बीमारियों का उपचार अब सबके लिए एक जैसा नहीं रहेगा, बल्कि अब यह हर मरीज के जीन (DNA) के आधार पर तय किया जाएगा। इसे प्रिसिजन मेडिसिन कहा जाता है, जिसमें उपचार अधिक सटीक, प्रभावी और व्यक्तिगत होता है। इससे स्वास्थ्य सेवाएं और ज्यादा उन्नत तथा प्रभावी हो जाएंगी।

यह बात अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में ‘डीएनए डे 2026’ पर आयोजित संगोष्ठी में सामने आई। विशेषज्ञों ने बताया कि जीनोमिक्स (डीएनए आधारित विज्ञान) के उपयोग से भविष्य में उपचार का तरीका बदलने वाला है। चिकित्सक मरीज की जेनेटिक जानकारी के आधार पर बीमारी का बेहतर निदान और सही उपचार कर सकेंगे।

जीनोमिक विज्ञान को क्लिनिकल प्रैक्टिस से जोड़ने पर जोर
संगोष्ठी में जीनोमिक विज्ञान को क्लिनिकल प्रैक्टिस से जोड़ने पर जोर दिया गया। संगोष्ठी का आयोजन डीएनए सोसायटी आफ इंडिया और सोसाइटी ऑफ यंग साइंटिस्ट्स (एसवाईएस-एम्स) ने संयुक्त रूप से कराया।

संगोष्ठी में 1953 में डीएनए की डबल हेलिक्स संरचना की खोज और 2003 में ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट की पूर्णता को भी रेखांकित किया गया।

उद्घाटन सत्र डीएनए सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष प्रो. अशोक शर्मा ने प्रिसिजन मेडिसिन में जीनोमिक्स की भूमिका पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि, सीएसआईआर इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलाजी (आईजीआईबी) के मुख्य वैज्ञानिक प्रो. अभय शर्मा ने मानव जीनोमिक्स और रोग विज्ञान पर न‌ई जानकारी साझा की। उन्होंने मानव जीनोमिक्स और रोग विज्ञान के उभरते आयामों को समझाया।

कैंसर: एपिजीनोम की बीमारी' पर शोध प्रस्तुत
मुख्य व्याख्यान में शिव नादर इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस के प्रो. संजीव गलांडे ने 'कैंसर: एपिजीनोम की बीमारी' पर शोध प्रस्तुत किया। डीएसआइ के वरिष्ठ कार्यकारिणी सदस्य प्रो. श्रीकांत कुकरेती ने जीनोमिक्स अनुसंधान और क्लिनिकल उपयोग के बीच सेतु बनाने की आवश्यकता बताई।

प्रीमास लाइफ साइंसेज के डा. भास्कर मैती ने स्पैटियल बायोलॉजी और मल्टीओमिक्स तकनीकों के उपयोग को समझाया। 300 से अधिक प्रतिभागियों की उपस्थिति वाले इस आयोजन में विशेषज्ञों ने ‘जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट’ और ‘आयुष्मान भारत’ जैसी पहलों को देश में किफायती और सुलभ जीनोमिक चिकित्सा के लिए अहम बताया।

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